नीतीश के दो दशक के “सुशासन” के बाद बिहार देश के सबसे पिछड़े राज्यों में

बिहार में पिछले बीस वर्षों से दो चीज स्थिर हैं। संक्षिप्त अंतराल को छोड़कर जब उन्होंने खुद ही जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था, शेष पूरे 20 साल से नीतीश कुमार स्वयं राज्य के मुखिया हैं। और दूसरी चीज है गरीबी जिसमें बिहार लगातार अव्वल बना हुआ है।

एक अध्ययन के अनुसार बिहार में हर तीन में से एक व्यक्ति बहुआयामी ग़रीबी में है, यानी स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर के मामले में बिहार सबसे ज़्यादा ग़रीबी वाले राज्यों की सूची में सबसे ऊपर है, जहाँ 33.76 प्रतिशत आबादी बहुआयामी ग़रीबी में है। नीति आयोग के अनुसार, झारखंड में यह आंकड़ा 28.81 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 22.93 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 20.63 प्रतिशत है। “

वैसे तो श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार, अखिल भारतीय औसत 3.2 प्रतिशत बेरोजगारी दर के मुकाबले, बिहार ने जुलाई, 2022 और जून, 2023 के बीच 3.9 प्रतिशत की बेरोजगारी दर दर्ज की। लेकिन इसकी बजाय निर्भरता अनुपात से बेरोजगारी और गरीबी का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है। बिहार में भारत का सबसे अधिक निर्भरता अनुपात 67.1 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि दो-तिहाई आबादी शेष एक तिहाई पर निर्भर है। यह भयानक बेरोजगारी बिहार की गरीबी के मूल में है।

वैसे तो बिहार में 2020-21 में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद मात्र 31,522 रुपये दर्ज किया गया जो कि कमजोर आर्थिक गतिविधि को दर्शाता है। लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह उत्पाद बहुत विषम भी है। ” बिहार के 38 जिलों में से 32 ने राज्य के औसत से कम प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद दर्ज किया और केवल छह जिलों ने राज्य के प्रदर्शन को ऊपर उठाया। बिहार राज्य आर्थिक सर्वेक्षण 2022-23 के अनुसार, 1.15 लाख रुपये पर, पटना ने प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद राज्य के औसत से लगभग चार गुना दर्ज किया। “

बहरहाल बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। जिलों के अंदर भी जो गरीब समुदाय हैं और वहां के अमीरों के बीच भी आय की भारी विषमता मौजूद है।

किसी भी राज्य में विकास का प्रमुख पैमाना वहां कल कारखानों की उपस्थिति है। बिहार इसमें भी स्वाभाविक रूप से सबसे पिछड़ा हुआ है। जिसका सीधा असर रोजगार के उपलब्ध अवसरों और गरीबी पर पड़ता है। बिहार कारखानों की तादाद और निर्यात में सबसे पिछड़े राज्यों में है।

” विनिर्माण क्षेत्र को आम तौर पर बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने के लिए जाना जाता है। हालांकि, बिहार में, इसने 2021-22 में राज्य जीवीए का केवल 7.3 प्रतिशत उत्पन्न किया, जबकि निर्माण द्वारा 8.5 प्रतिशत और कृषि और संबद्ध गतिविधियों द्वारा 21 प्रतिशत उत्पन्न किया गया, जैसा कि बिहार राज्य आर्थिक सर्वेक्षण से पता चलता है।

भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों से पता चलता है कि बिहार में कारखानों की संख्या 3,231 थी, जो 2011-12 में देश के कारखानों का 1.5 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 1.4 प्रतिशत या 3,429 कारखाने रह गई है। कम विनिर्माण और कुछ कारखानों के साथ, देश के निर्यात में बिहार का योगदान नगण्य है। 

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के अनुसार, 2022-23 में गुजरात का निर्यात 30.7 प्रतिशत, महाराष्ट्र का 18.3 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश का 10.3 प्रतिशत था, जबकि बिहार ने देश के निर्यात में केवल 1.4 प्रतिशत का योगदान दिया।वर्तमान में, राज्य का बुनियादी ढांचा भी इसकी आर्थिक गतिविधियों के विस्तार के लिए अनुकूल नहीं है। “

बिजली की उपलब्धता भी विकास का एक महत्वपूर्ण पैमाना है। “आरबीआई के आंकड़ों से पता चलता है कि 2022-23 में प्रति व्यक्ति औसत बिजली उपलब्धता 1221 किलोवाट घंटे है, जबकि बिहार में केवल एक तिहाई यानी 373.4 किलोवाट घंटे ही उपलब्ध है।”

आए दिन घट रही अपराध की बड़ी-बड़ी घटनाओं के बीच जंगल राज जब चुनाव का मुख्य मुद्दा नहीं रह जाएगा, तब स्वाभाविक रूप से विमर्श विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे विषयों पर केंद्रित हो जाएगा और इसमें देश के फिसड्डी राज्य के मुखिया के बतौर नीतीश कुमार और उनके साथ भाजपा निशाने पर होंगे। 

नए कल कारखानों की बात छोड़िए, बंद चीनी मिलें तक नहीं खुल पाईं जिसका वायदा स्वयं प्रधानमंत्री पिछले चुनाव के समय जनता से करके आए थे।

बिहार की भयावह गरीबी का एक अन्य प्रमुख कारण यह भी है कि पूरे राज्य में अंग्रेजों के समय में स्थाई बंदोबस्त ( permanent settlement)लागू था फलस्वरूप चंद जमींदारों को छोड़कर जो लगान वसूल कर अंग्रेजों को देते थे, शेष विराट किसान आबादी भूमिहीन थी। 

आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन और सीलिंग कानून लागू होने के बावजूद आमतौर पर वह जमीन पर लागू नहीं हो पाया क्योंकि सरकारों में इसकी इच्छा शक्ति नहीं थी। उस दौर की सरकारों में प्रायः सामंती ताकतों का ही वर्चस्व था। मठ मंदिर और दूसरी तरह-तरह की तिकड़मों से वे जमीन अपने कब्जे में रखने में सफल रहे। इससे थोड़ी बहुत ही जमीन गरीब किसानों के पास आ सकी । भूमि सुधार के लिए नीतीश कुमार ने जो बंद्योपाध्याय कमेटी बनाई थी, उसकी रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली गई। 

कृषि क्षेत्र में सामंती अवशेषों की गहरी उपस्थिति के कारण न कृषि का आधुनिकीकरण हो सका, न समान वितरण हो सका। नतीजतन पूरा कृषि क्षेत्र, जिस पर राज्य की विराट आबादी निर्भर है, पिछड़ा रह गया। सामंती उत्पीड़न भी बना रहा। सामंती उत्पीड़न के खिलाफ मान-सम्मान तथा जमीन, मजदूरी के लिए अथक संघर्ष चलाते हुए तथा अनगिनत बलिदान देते हुए भाकपा माले ने ग्रामीण गरीबों को संगठित किया और उन्हें राजनीतिक ताकत बनाया।

जाहिर है बिहार के विकास के लिए समग्र रणनीति की जरूरत है। भूमि सुधार, कृषि का चौतरफा विकास, कृषि आधारित उद्यम, औद्योगीकरण और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन तथा सारे खाली सरकारी पदों पर बहाली जैसे मुद्दों को चैंपियन करते हुए महागठबंधन सत्ता पर कब्जा कर सकता है और वामपंथ के समर्थन और दबाव से बिहार में समता और विकास के एक नए युग का सूत्रपात कर सकता है।

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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